The Dark Reality of Being a Doctor: Stress, Burnout & Mental Health
-डॉ. सुष्मिता मुखर्जी द्वारा
डॉ. सुष्मिता मुखर्जी इंदौर की एक अत्यंत अनुभवी स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनेकोलॉजिस्ट), प्रसूति विशेषज्ञ और इनफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट हैं, जिनके पास 35 वर्षों से अधिक का अनुभव है।
वह लेप्रोस्कोपी, हाई-रिस्क प्रेगनेंसी और IVF उपचार में विशेषज्ञता रखती हैं।
डॉ. सुष्मिता मुखर्जी ओल्ड पलासिया स्थित अपने Fertility & Laparoscopic Clinic में प्रैक्टिस करती हैं और अब तक 30,000 से अधिक सर्जरी कर चुकी हैं।
परिचय
आज हम अक्सर डॉक्टर्स को एक हीरो की तरह देखते हैं — जो पेशेंट्स को ठीक करते हैं, लाइफ की सबसे मुश्किल सिचुएशंस को हैंडल करते हैं।
लेकिन एक सवाल बहुत कम पूछा जाता है — डॉक्टर्स खुद मेंटली कैसा फील करते हैं?
इस ब्लॉग में हम बात करेंगे मेडिकल फील्ड में बढ़ते स्ट्रेस, डिप्रेशन, बर्नआउट और उन रियल इश्यूज की जिनके बारे में लोग खुलकर बात नहीं करते।
मेडिकल प्रोफेशन: जितना दिखता है उससे कहीं ज्यादा कठिन
मेडिकल फील्ड सिर्फ किताबों की पढ़ाई नहीं है।
- यहां डेड बॉडी डिसेक्शन है
- पेशेंट्स की तकलीफ रोज देखनी पड़ती है
- डेथ को फेस करना पड़ता है
- इमरजेंसी, लॉन्ग शिफ्ट्स, नींद की कमी — ये सब नॉर्मल है
और सबसे बड़ी बात —
यह एक प्रोलॉन्ग्ड स्ट्रेस है, जो सालों तक चलता है (MBBS → Internship → PG → Practice)
इसलिए वर्ल्डवाइड लगभग 30-40% मेडिकल प्रोफेशनल्स में डिप्रेशन और एंग्जायटी देखी गई है, और कुछ केस में सुसाइडल टेंडेंसी भी।
क्यों बढ़ रहा है मेडिकल स्टूडेंट्स में डिप्रेशन?
कुछ मेजर कारण:
1. भारी और डिफिकल्ट करिकुलम
- बहुत सारे सब्जेक्ट्स
- हर जगह पास होना जरूरी
- छोटी गलती = फेल
2. एग्जाम स्ट्रेस
- बार-बार खुद को प्रूव करना
- परफॉर्मेंस माइंडसेट पर निर्भर
3. इमोशनल एक्सपोज़र
- पेशेंट्स की तकलीफ
- डेथ का सामना
4. लाइफस्टाइल डिसबैलेंस
- खाने का टाइम नहीं
- नींद नहीं
- सेल्फ केयर नहीं
“हम तो डॉक्टर हैं, हमें स्ट्रेस कैसे हो सकता है?”
यह सबसे बड़ी समस्या है।
बहुत सारे मेडिकल स्टूडेंट्स और डॉक्टर्स सोचते हैं:
“हम तो लोगों को ठीक करते हैं, हम खुद डिप्रेस कैसे हो सकते हैं?”
यही सोच उन्हें हेल्प लेने से रोकती है।
- लोग क्या सोचेंगे
- इमेज खराब हो जाएगी
- “मैं वीक दिखूंगा”
इस वजह से हेल्प लेना बहुत लेट हो जाता है
डिप्रेसिव थॉट्स vs सुसाइडल थॉट्स
हर डिप्रेसिव थॉट सुसाइडल नहीं होता।
लेकिन ध्यान रखना जरूरी है:
- अगर बच्चा ज्यादा चुप हो रहा है
- सोशलाइज नहीं कर रहा
- खाना नहीं खा रहा
- नेगेटिव बातें कर रहा
ये रेड फ्लैग साइन हैं
कॉलेज और फ्रेंड्स का रोल
मेडिकल कॉलेज में:
- ग्रुप स्टडी बहुत हेल्पफुल है
- क्लोज फ्रेंड्स सबसे पहले पहचानते हैं प्रॉब्लम
- एक सपोर्ट सिस्टम जरूरी है
ideally होना चाहिए:
- मेंटल हेल्थ मॉनिटरिंग
- कॉन्फिडेंशियल काउंसलिंग सेल
क्या करना चाहिए जब आप खुद स्ट्रगल कर रहे हों?
अगर आपको लग रहा है कि:
- नेगेटिव थॉट्स बढ़ रहे हैं
- अकेलापन अच्छा लग रहा है
- एंग्जायटी हो रही है
तो:
1. कारण समझें
- पढ़ाई का प्रेशर?
- रिलेशन?
- फैमिली इश्यू?
2. एक्सेप्ट करें
- फेलियर मेडिकल लाइफ का हिस्सा है
- इससे आप खराब डॉक्टर नहीं बनते
3. रूटीन बनाएं
- एक्सरसाइज / योगा
- सही डाइट
- नींद
4. बात करें
- फ्रेंड
- रिलेटिव
- काउंसलर
सबसे जरूरी: हेल्प लेने में शर्म नहीं होनी चाहिए
पेरेंट्स के लिए जरूरी मैसेज
- सिर्फ एडमिशन दिलाना काफी नहीं है
- रेगुलर कम्युनिकेशन जरूरी है
- मेंटल हेल्थ को फिजिकल हेल्थ जितना ही सीरियस लें
अगर बच्चा संकेत दे रहा है — उसे इग्नोर न करें
मेडिकल लाइफ के सबसे स्ट्रेसफुल फेज
- Final MBBS Exam
- PG Residency First Year
- पहली बार पेशेंट डेथ देखना
ये फेज बहुत इमोशनल और मेंटली चैलेंजिंग होते हैं।
पहली बार डेथ देखना: एक रियल ट्रॉमा
जब डॉक्टर पहली बार किसी पेशेंट की डेथ देखते हैं:
- कई दिनों तक वो याद रहता है
- guilt feel होता है
- “और क्या कर सकते थे?”
इस समय सीनियर्स और गाइडेंस बहुत जरूरी होता है
कोविड के बाद क्या बदला?
कोविड के बाद:
- लोग मेंटल हेल्थ के बारे में ज्यादा ओपन हुए
- लाइफ की वैल्यू समझी
अब जरूरत है:
और ज्यादा awareness + early action
डाइट और मेंटल हेल्थ का कनेक्शन
“आप जो खाते हैं, वही बनते हैं”
- गट हेल्थ = ब्रेन हेल्थ
- खराब डाइट → एंग्जायटी, स्ट्रेस बढ़ता है
Avoid:
- फास्ट फूड
- ज्यादा शुगर
- बहुत मसाला
Include:
- सलाद
- फल
- नट्स
- प्रोटीन
एक बहुत इंपॉर्टेंट सच
हर हाई स्कोर करने वाला डॉक्टर अच्छा डॉक्टर नहीं बनता
हर फेल होने वाला खराब डॉक्टर नहीं होता
एक अच्छा डॉक्टर बनने के लिए चाहिए:
- कम्युनिकेशन
- पेशेंट का ट्रस्ट
- इमोशनल समझ
फाइनल मैसेज
- मेडिकल फील्ड एक डेडिकेटेड और डिमांडिंग लाइन है
- मेंटल हेल्थ को इग्नोर करना सबसे बड़ी गलती है
- हेल्प लेना कमजोरी नहीं है
“लाइफ बहुत प्रेशियस है — उसे पॉजिटिव तरीके से जीना सीखें।”
